25th Sunday in Ordinary time- Sunday Gospel

वर्ष का 25वाँ सामान्य रविवार

25th Sunday in Ordinary time- Sunday Gospel

पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ                                        अध्याय: 55 : 6-9
दूसरा पाठ : पिलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र        अध्याय: 1 : 20-24, 27
सुसमाचार :सन्त मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार          अध्याय : 20:1-16

25th Sunday in Ordinary time- Sunday Gospel

25th Sunday in Ordinary time- Sunday Gospel

पहला पाठ :

           इसायाह का ग्रन्थ                                           अध्याय:       55 : 6-9

     जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसके पास चली जा। जब तक वह निकट है, तब तक उसकी दुहाई देती रह। पापी अपना मार्ग छोड़ दे और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दे। वह प्रभु के पास लौट आये और वह उस पर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है। प्रभु यह कहता- तुम लोंगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकाश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा हैं। उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।

दूसरा पाठ : 

    पिलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र                       अध्याय:       1 : 20-24, 27

मेरी हार्दिक अभिलाषा और आशा यह है कि चाहे मैं जीवित रहुँ या मरूँ, मुझे किसी बात पर लज्जित नहीं होना पड़ेगा और मसीह मुझ में महिमान्वित होंगे। मेरे लिए तो जीवन है- मसीह, और मृत्यु है उनकी पूर्ण प्राप्ति। किन्तु यदि मैं जीवित रहुँ, तो सफल परिश्रम कर सकता हूँ, इसलिए मैं नहीं समझ पाता कि क्या चुनूँ। मैं दोंनों और ओर खिंचा हुआ हूँ। मैं तो चल देना और मसीह के साथ रहना चाहता हूँ। यह निश्चय ही सर्वोत्तम है; किन्तु शरीर में मेरा विधमान रहना आप लोगों के लिए अधिक हितकर है। मुझे पक्का विश्वास है कि मैं आपके साथ रह कर आपकी सहायता करूँगा, जिससे आपकी प्रगति हो और विश्वास में आपका आनन्द बढ़े। आप लोग एक बात का ध्यान रखें आपका आचरण मसीह के सुसमाचार के योग्य हो। इस तरह मैं चाहे आ कर आप से मिलूँ, चाहे दुर रह कर आप के विषय में सुमूँ, मुझे यही मालूम हो कर अटल बने हुए हैं, एकह्रदय हो कर सुसमाचार में विश्वास के लिए प्रयत्नशील हैं।

25th Sunday in Ordinary time- Sunday Gospel

सुसमाचार : 

            सन्त मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार                                अध्याय : 20:1-16

तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

 “स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश हैं, जो अपनी दाखबारी में मजदूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला। उसने मजदूरों के साथ एक दिनार का रोजाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा। लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चौक में बेकार खड़ा देख कर कहा, तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ मैं तुम्हें उचित मजदूरी दे दूँगा। और वे वहाँ गये। लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया। वह एक घंटा दिन रहे फिर बाहर निकला और वह दूसरों को खड़ा देखकर उन से बोला, ‘तुम लोग यहाँ दिनभर क्यों बेकार खड़े हो’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘इसलिए कि किसी ने हमें मजदूरी में नहीं लगाया’। उसने उनसे कहा, ‘तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ’।

 संध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दे से कहा, ‘मजदूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से लेकर पहले आने वालों तक, सब को मजदूरी दे दो। जब वे मजदूर आये, जो एक घंटा दिन रहे काम पर लगाए गए थे, तो उन्हें एक-एक दिनार मिला। जब पहले मजदूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दिनार ही मिला। उसे पा कर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

 इन पिछले मजदूरों ने केवल घंटे भर काम किया। तब भी अपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’ उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ‘भाई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दिनार नहीं तय किया था ?

 अपनी मजदूरी लो और जाओ मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ। क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी संपत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?  इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे।”

THANK YOU

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