33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020

 

33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020
 
 33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020 आज वर्ष का ३३वाँ सामान्य रविवार हैं। आज का पहला पाठ  सूक्ति ग्रन्थ के अध्याय  31:10-13,19-20,30-31|और दूसरा पाठ को थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र के  अध्याय 5:1-6 से लिया गया हैं। और सुसमाचार को सन्‍त मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार के  अध्याय 25:14-30 से लिया गया हैं। तो आईये आज का पवित्र बाईबिल वचन को हम पढते हैं। आप सभी को हमारे Jesus Christ Help ब्लॉग में स्वागत है।

33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020

पहला पाठ:सूक्ति ग्रन्थ |   अध्याय  31:10-13,19-20, 30-31|

सच्चरित्र पत्नी किसे मिल पाती है! उसका मूल्य मोतियों से भी बढकर है। उसका पति उस पर पूरा-पूरा भरोसा रखता और उस से बहुत लाभ उठाता है। वह कभी अपने पति के साथ बुराई नहीं, बल्कि जीवन भर उसक भलाई करती रहती है। वह ऊन और सन खरीदती और कुशल हाथों में कपडे तैयार करती है। उसके हाथों में चरखा रहा करता है, उसकी उँगलियाँ तकली चलाती हैं। वह दीन-दुःखियों के लिए उदार है और गरीबों को सँभालती है। रूप-रंग माया है और सुन्दरता निस्सार है। प्रभु पर श्रद्धा रखने वाली नारी ही प्रशंसनीय है। उसके परिश्रम का फल उसे दिया जाये और उसके कार्य सर्वत्र उसकी प्रशंसा करें

दूसरा पाठ: थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र| अध्याय 5:1-6

    भाइयो! आप लोग अच्छी तरह जानते हैं कि प्रभु का दिन, रात के चोर की तरह, आयेगा। इसलिए इसके निश्चित समय के विषय में आप को कुछ लिखने की कोई जरूरत नहीं है। जब लोग यह कहेंगे : ‘अब तो शान्ति और सुरक्षा है’, तभी विनाश उन पर गर्भवती पर प्रसव-पीडा की तरह, अचानक आ पड़ेगा और वे उस से बच नहीं सकेंगे। भाइयो! आप तो अन्धकार में नहीं हैं, जो वह दिन आप पर चोर की तरह अचानक आ पड़े। आप सब ज्योति की सन्‍तान हैं, दिन की सन्‍तान हैं। हम रात या अन्धकार के नहीं है। इसलिए हम दूसरों की तरह नहीं सोयें, बल्कि जगाते हुए सतर्क रहें।

33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020

सुसमाचार: सन्‍त मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार| अध्याय 25:14-30

    “स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जिसने विदेश जाते समय अपने सेवकों को बुलाया और उन्हें अपनी सम्पत्ति सौंप दी। उसने प्रत्येक की योग्यता का ध्यान रख कर एक सेवक को पाँच हजार, दूसरे को दो हजार और तीसरे को एक हज़ार अशर्फियाँ दीं। इसके बाद वह विदेश चला गया। जिसे पाँच हजार अशर्फियाँ मिली थीं, उसने तुरन्त जा कर उनके साथ लेन-देन किया तथा और पाँच हजार अशर्फियाँ कमा लीं। इसी तरह जिसे दो हजार अशर्फियाँ मिली थी, उसने और दो हजार कमा ली। लेकिन जिसे एक हजार अशर्फियाँ मिली थी, वह गया और उसने भूमि खोद कर अपने स्वामी का धन छिपा दिया। बहुत समय बाद उन सेवकों के स्वामी ने लौट कर उन से लेखा लिया। पाँच हजार अशर्फियाँ मिली थीं, उसने और पाँच हजार ला कर कहा, “स्वामी! आपने मुझे पाँच हजार अशर्फियाँ सौंपी थीं।

33rd Sunday in Ordinary Time- 15 Nov 2020

     देखिए, मैंने और पाँच हजार कमायीं।’ उसके स्वामी ने उस से कहा, ‘शाबाश, भले और ईमानदार सेवक! तुम थोड़े में ईमानदार रहे, मैं तुम्हें बहुत पर नियुक्त करूँगा। अपने स्वामी के आनन्द के सहभागी बनो।’ इसके बाद वह आया, जिसे दो हजार अशर्फियाँ मिली थीं। उसने कहा, “स्वामी! आपने मुझे दो हज़ार अशर्फियाँ सौंपी थीं। देखिए, मैंने और दो हजार कमायीं।’ उसके स्वामी ने उस से कहा, ‘शाबाश, भले और ईमानदार सेवक! तुम थोडे में ईमानदार रहे, मैं तुम्हें बहुत पर नियुक्त करूँगा। अपने स्वामी के आनन्द के सहभागी बनो।’ अन्त में वह आया, जिसे एक हजार अशर्फियाँ मिली थीं, उसने कहा, “स्वामी! मुझे मालूम था कि आप कठोर हैं। आपने जहाँ नहीं बोया, वहाँ लुनते हैं और जहाँ नहीं बिखेरा, वहाँ बटोरते हैं। 

    इसलिए मैं डर गया और मैंने जा कर अपना धन भूमि में छिपा दिया। देखिए, यह आपका है, इस लौटाता हूँ।’ स्वामी ने उसे उत्तर दिया, “दुष्ट! तुझे मालूम था कि मैंने जहाँ नहीं बोया, वहाँ लूनता हूँ और जहाँ नहीं बिखेरा, वहाँ बटोरता हूँ, तो तुझे मेरा धन महाजनों के यहाँ जमा करना चाहिए था। तब मैं लौटने पर उसे सूद के साथ वसूल कर लेता। इसलिए ये हजार अशर्फियाँ इस से ले लो और जिसके पास दस हजार हैं, उसी को दे दो; क्‍योंकि जिसके पास कुछ हैं, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा; लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है। और इस निकम्मे सेवक को बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगेऔर दाँत पीसते रहेंगे।

आमेन

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