Jesus Holy Cross

          क्रूस ईश्वर पुत्र ईसा की हंत्या के लिए इस्तेमाल किया उपकरण है । ईसा को चढाने के लिए जिस क्रूस का इस्तेमाल किया गया, वह काठ का था । क्रूसित ईसा ने पुनर्जीवन पाय तो निन्दा, अपमान, शाप और दण्ड का उपकरण मानवकुल की रक्षा, महत्ता, विजय और पुनर्जीवन का चिह्न बन गया । जो विनाश के मार्ग पर चलते हैं, वे क्रूस की शिक्षा को मूर्खता समझते हैं । किन्तु हम लोगों के लिए, जो मुक्ति के मार्ग पर चंलते हैं, वह ईश्वर का सांमर्ध्व है (1 कुरि.1 : 18) । अविश्वासियों को क्रूस मूर्खता ओंर शंका देता है । रोमियों, यूनानियों ओंर यहूदियों को क्रूस अपमान और निन्दा का उपकरण था । यदि किसी ने मृत्युदण्ड पाने योग्य अपराध किया है और काठ पर लटका कर उसका वध किया गया है (विधि 21:22) । यहूदियों के लिए क्रूस पर लटकाया जां कर मरना ईश्वरीय शाप उस पर पडने के समान है । ईसा ने अपने प्राणों के ज़रिए, दीनहीनता के ज़रिए क्रूस को नया अर्थ दे दिया । मरण तक हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन वना लिया (फिलि 2:8) ।

क्रूस का महत्व  

पवित्र आत्मा के आगमन के बाद प्रेरित शिष्यों ने ईसा को मुक्तिदाता होकर पेश किया और ऐसे भाषण दिया । वह ईश्वर के विधान और पूर्वज्ञान के अनुसार पकडवाये गये और आप लोगों ने विधर्मियों के हाथों उन्हें क्रूस पर चढवाया और मरवा डाला है (प्र. च. 2 : 23) । उसके बारे में तो कुछ लिखा गया था, उसकी पूर्ति हुई तो उन्होंने उसे क्रूस से निकाल कर कब्र पर संस्कार किया (प्रे.च. 13:29) । क्रूस की शक्ति माने उसमें छिपा हुआ रहस्य और उसका प्रकटीकरण है । एक ईसाई का पूरा ज्ञान क्रूसित में है । सन्त पौलुस ने क्रुरिन्तियों को लिखा, मैं ने निश्चय किया था कि मैं आप लोगों से ईसा मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं करूँगा (1 कुरि 2:2) । सन्त योहन के सुसमाचार में दु:ख-भोगों का वर्णन ईसा के महत्व का भर-पूर वर्णन है । जो सैनिक ईसा को गिरफ्तार करने आये उनसे ईसा ने कहा कि मैं ही नाज़री ईसा हूँ, तो वे सब पीछे हट कर भूमि पर गिर पडे (योहन 18 : 1-11 ) । यहाँ से लेकर बहुमूल्य सुगन्ध्रद्रव्य लगा कर बहुमूल्य कफ़न में ढंक कर कब्र पर रखते तक (योहन 19:37-42) सारी घटनाएँ महत्व की झलकों से युक्त हैं।
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ईसाई की निशानी

 शिष्य गुरू की भाँति हो, यह ईसा का आह्वान था ।  इसके बाद ईसा ने शिष्यों से कहा. जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और वह अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले (मत्ती 18:24) । ईसाई जिस क्रूस का संवहन करता हैं, वह एक निशानी है जो कि अपने आप और दुनिया के प्रति वह मर चुका है। इस निशानी के होते हुए ही एक ईसाई अपने जैसे दूसरे का प्यार कर सकता है। यह प्रेम त्याग की माँग करता है। सन्त मदर तेरेसा ने एक बार कहा, आज दुनिया का सबसे बडी अकाल प्रेम का अकाल है । मगर हर कोई प्रेम है चाहता है। ईसा ने स्वप्राण को हमारे लिए त्याग दिया, इससे हम समझते हैं कि प्रेम वया है? हमें भी अपने भाइयों के लिए प्राणात्याग करना चाहिए (1 योहन 3:16) पोप फ्रान्सीस ने कहा, ‘ईसाइयों का पहचान-पत्र है, प्रेम । फिर आपने कहा, प्यार और खुशी के लिए जो ‘फोण एप्तिवकेशन’ है. उसे ‘डाउनलोड’ करना असंभव हैं। हम जो वस्तुएँ अपनाते हैं और इच्छित जो काम काते है, उनसे आजादी और खुशी नहीँ मिलतीं । बल्कि वे ईसा के प्रेम से मिलती हैं । प्रेम को मूल्य देकर खरीदने की ज़रूरत नहीं। इसके लिए खुला और उदारपूर्ण दिल चाहिए । क्या आप सीमित साधनों से खुश रह सकेंगे? दुनिया ओर संचार माध्यम हमें यह भ्रम देते रहते हैं कि जीबन को सुन्दर बनाने के लिए अनेकानेक साधनों की उपलब्धि की ज़रूरत है। ईसा का अनुगमन करने में जो कुछ बाधाएँ है, वे सारे सहज संबन्ध छोडें, स्वप्राण भी ईसा के लिए देने की तैयारी करें, इनकी निशानी है, क्रूस । जो अपना क्रूस उठा कर मेरा अनुसरण नहीं करता, वह मेरे योग्य नहीं (मत्ती 10:38) ।

क्रूसित का जीवन

ईसाई का रोजाना जीवन क्रूसित है। जो लोग ईसा मसीह के हैं, उन्होंने वासनाओं तथा कामनाओं सहित अपने शरीर को क्रूस पर चढा दिया है (गला 5:24) । बपतिस्मा में ईसा के साथ क्रूसित ईसाई नियमानुसार मर चुका, फिर वह ईश्वर के लिए जिन्दा हैं । क्योंकि जैसा कि मैं आप से बार बार कह चुका हूँ और अब रोते हुए कहता हूँ, बहुत से लोग ऐसा आचरण करते हैं कि मसीह के क्रूस के शत्रु बन जाते हैं (फिलि 3:18-19) । हमारे निजी जीवनं, सामाजिक जोबर्ग,पारिवारिक जीवन कर्मं-क्षेत्र आदि सब कहीं अनेकानेक समस्यायें होंगी, तनाव के कई कारण होंगे। ईसा ने कहा , थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो ! तुम सभी मेरे पास आओं। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा । मेरा जुआ अपंने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो । मैं स्वभाव से नम्न और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे (मत्ती 11:28- 29) । वचन के ज़रिए ईसा ने बडा, वादा दिया हैं-मैं तुम्हें सान्त्वना दूँगा। यह कैसे संभव है? सबसे पहले ईसा की हाजिरी का एहसास हमारे मन में हो । इससे ईसा को जीवन में मुख्य स्थान दें । तब तो उनकीं दिव्यरोंशनी से प्रतिकूल माहोल में भी जीवन का सही अर्थ हम समझ पायेंगे । तब तो क्रूसों से हम भयभीत न होंगे । आप लोगों को न केवल मसीह में विश्वास करने का, बल्कि उनके कारण दु:ख भोगने का भी वरदान मिला है (फिलि 1: 29) । इस प्रकार ईश्वर-भक्त मनुष्य पूर्णता पाता हैं और सभी भले काम करने लायक समर्थ हो जाता है (2 तिमथी 3:17) ।

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