Mother Mary’s Joy in Jesus

प्रभु में आनन्द,,,माँ मरियम,,

           मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है, मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है’-यह मरियम की वाणी है (लूकस 1:46-47)
      बाहर से देखने पर उनकी स्थिति सन्तोषजनक न थी, बल्कि वह भयानक थी। नाज़रेत के बढई यूसुफ़ के साथ उस युवती की सगाई संपन्न हुई थी; प्रतिश्रुत दूल्हे के अनजाने वह गर्भवती हुई। ईश्वर की खास दस्तंदाज़ी से मैं गर्भवती हो चुकी हूँ, यह कहें तो क्या कोई उस पर भरोसा करेगा? पता जान कर यदि यूसुफ़ शादी करने से अलग रहें तो लोगों का फैसला होगा, पत्थर की मार खा कर उसे मरना पडेगा। यह बाइबिल में वर्णित दंड-विधान है (विधि 22:13-21)। ईश्वरदूत से सन्देश सुनते ही करीब 130 की.मी यात्रा करके यहूदिया के ऐन करीम नामक गाँव की ओर जल्दी रवाना हुई, जो किए अपराध का प्रमाण माना जा सकता है। सत्नाम, ईमानदारी ही नहीं जीवन न्याय के तुले पर मानो लटकने वाला है।
     मगर उसे ज़रा भी डर नहीं। उसके मन में कोई डरावने विचार या सपने नहीं। खुद ईश्वर ने उन्हें बुलाया और ईश्वर पुत्र की माता बनने का दायित्व दिया। यह उनका दृढ विश्वास था। प्रभु के लिए कुछ भी असंभव नहीं। दूत का यह प्रस्ताव उसके लिए लायक जवाब था। जीवन की भेंढ चढाने लायक दृढता भी। ‘देखिए !प्रभु की दासी, आप का वचन मुझ में पूरी हो जाये’- इस जवाब में विश्वास को प्रकट करने लायक विनम्रता है। प्रभु पर अपना आसरा प्रकट करने लायक आत्मसमर्पण है। विश्वास,अनुसरण,और आत्मसमर्पण- मरियम की खुशी के कारण हैं । जिन्होंने बुला कर अपनाया, उस मालिक के हाथों में अपने-आप को सौंपना, यह दासी का काम है । आगे अपने जीवन रास्ते और लक्ष्य का निर्णय करने वाले अपने प्रभु ही है, जिनके बारे में उसने घोषणा की थी। अटूट और अडिंग विश्वास और समर्पण ने उसे जो सुरक्षा-बोध ओर संतोष प्रदान किए, उनकी कोई सीमा नहीं । अपने जीवन का एक ही लक्ष्य है, प्रभु की इच्छा निभाना ।यही उनकी खुशी का कारण हे ।
    अपने संबन्धी एलिज़बेथ की खुशी, स्तुति-भजन और भविष्यवाणी ने मरियम की अन्तरात्मा में आनन्द की तरंगें पैदा कीं । ’ मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है, मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्त मनाता हैं -’ ’माग्निफिक्कात्त’ नाम से जाना जाता यह भजन बाइबिल से लिया गया , ज्यादा जाना जाता और इस्तेमाल किया जाता भजन है ।
      प्रभु के महत्व की स्तुति के फैसले का प्रारंभिक वचन के बाद (1, 46-47) गीत दो भागों में विभक्त किया गया है । 1. मरियम का वैयक्तिक अनुभव (1:48-40) 2 . इतिहास से चलते ईश्वर की मुक्तिदायक करनी (1:50-55)। प्रभु का गुणगान करना माने जो कुछ नहीं हे, उसे बता कर बडा करना नहीं; माग्निपै (magnify) इस शब्द को ऐसा अर्थ है तो भी जो नहीं है, उसे बनाना, जो कुछ है, उसे बढा-चढा कर बताना नहीं, जो महत्व है, जो बडप्पन है, उसे मुक्तियोजना के पूरे इतिहास में भरी रहती ईश्वरीय शक्ति पहेरदारी, करुणा की घोषणा करते वक्त ईश्वर कौन है, क्या करते हैं. यह प्रकट करते हैं। इस प्रकार ईश्वर-महत्व अनेकों को अनुभव्य हो जाता है!
    ईश्वर की इच्छा के प्रति अपने को चढायी मरियम के विचार स्मरणा और आशा में केवल ईश्वर ही भरा हुआ है । यह उसके आनन्द का कारण भी है । ‘मेरा ह्रदय मेरे मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है । ‘ मेरे मुक्तिदाता’ इस विशेषण पर जो ज़ोर दिया गया है, उसे न भूलें । ईश्वर’के साथ उसका जो असाधारण निजी संबन्ध है, वह मरियम के ह्रदय में खुशी भरी रहने’ का कारण है। प्रभु की दासी बने रहने में प्रभु की अपनी ही बने रहने की सफलता है जो भजन का आन्तरिक धारा है।
    दासी की विनम्रता के बारे में आत्मावचेतना’ हीनता-बोध की ओर नहीं, बल्कि आश्रय और आनन्द की ओर ले जाती है। अपना कुछ भी नहीं, सबकुछ ईश्वर का कृपादान है। सर्वशक्त ईश्वर अपने में तथा अपने ज़रिए जो महान कार्यं करते हैं, वह है – लोकोद्धारक हो कर अपने अकेले बेटे को पृथ्वी भेजा हे । ईश्वरपुत्र का मानवावतार है, आनन्ददायक सुसमाचार । उसमें वह भी एक उपकरण हो चुकीं है । इसकी सुव्यक्त निशानी रही, एलिजबेथ और उसका गर्भस्थ शिशु पवित्र आत्मा से भर उठे तथा स्तुति-वचन एलिज़बेथ के अधरों से निकला।
     अपने को मिला यह ईश्वरानुभव और उससे उद्-भूत आनन्द सभी मनुष्यों को उलब्ध है, मरियम ने फिर घोषणा की। विश्वास की दृष्टि से मरियम इतिहास को देखती है, अत: ईश्वर का हस्तक्षेप हर कहीं चलता है, जिसे वह देखती है। दीन-हीन, गरीब और उपेक्षित व्यक्ति ईश्वर की करुणा और कृपा का अनुभव करके खुश हो जाते हैं। ठीक इसी समय मनुष्य की दृष्टि में जो शक्त, अमीर घमण्डी और उच्च हैं, वे उपेक्षित कियें जाते हैं। मनुष्य निर्मित बडप्पन को सिर औधा करके खडा करना ईश्वर की दस्तंदाजी है । ईसा मसीह के जरिए सही मूल्य के क्षेत्र और व्यावहारिक क्षेत्र में सम्पूर्ण कायापतट की शुरूआत है अथवा सारतत्व है । यह मरियम के भजन में देख सकते हैं।
     प्रभु ही मेरे मुक्तिदाता है, मेरे ईश्वर हैं। मेरा स्रोत और लक्ष्य प्रभु ही है। मेरी जिन्दगी और मेरे प्राण प्रभु में सुरक्षित हैं । जब यह चेतना मन में है, तब भय दूर होगा, मन में आनन्द भर उठेगा। दु:ख, शंका आदि से मन सुरक्षित रहेगा । यह मुक्तिदाता ईसा की माता मरियम के भजन का पाठ है । अत: निडर होकर सदा हम गयें -मेरी आत्मा प्रमु का गुणगान गाती है – मेरा ह्रदय मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है। ०

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