Parable of Jesus

खोयी हुई वस्तु की प्राप्ति पर बडी खुशी,,,,

Parable of jesus

मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार निन्यानवे धर्मियों की अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं है, एक पश्चात्ता पी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा” (लूकस 15:9) ।


       अन्य तीनों सुसमाचारों की अपेक्षा लूकस का समाचार ‘खुशी के प्रमेय पर ज्यादा ज़ोर दे चुका है। इसलिए लूकस के सुसमाचार को ’ खुशी का सुसमाचार’ बुलाते हैं । इस सुसमाचार के आरंभ से लेकर (1:14) अन्त तक ( 24: 52-53)  ।  आनन्द, और हर्ष की प्रतिध्वनि सुनाई पडती ‘है। मगर सुसमाचार का सारसर्वस्व तथा ‘ सुसमाचारों का सुसमाचार’ नाम से विशेषित 15- वें अध्याय में यह खुशी ज्यादा प्रकट होती है। भडकी हुई भेड, खोया हूआ सिक्का, खोया हुआ लडका- इस प्रकार तीन दृष्टान्त 15 वें अध्याय में हैं । इन दृष्टान्तों के शीर्षक आम तौर पर  मान्यताप्राप्त है, किन्तु दृष्टान्तों के सही अर्थ को प्रकट करने के लिए समर्थ नहीं । यह इनकी सही जांच से समझ में आता है। भटकी हुई भेड, खोया हुआ सिक्का और लडका नहीं, बल्कि इन्हें ढूँढता चरवाहा तथा मालकिन और बेटे की वापसी के लिए इन्तज़ार करता पिता ही मुख्य पात्र हैं। तीनों दृष्टान्तों में खुशी के भाव ज़ोरों से हैं। इनमें दो दृष्टान्त यहाँ व्याख्या के लिए चुन लिये गये हैं। तीसरा अगले लेख में परामर्श विषय बनाया जायेगा।

          जब कभी बाइबिल-भागों की व्याख्या करें तब उससे संबद्ध माहौल को भी मानें जो बाइबिल व्याख्या का बुनियादी तत्व है। यह नियम यहाँ प्रतिपादित दृष्टान्तों की व्याख्या का अर्थ समझने में सहायक होगा । ईसा की ज़िन्दगी, उनके कर्म, उपदेश आदि के प्रति लोगों की दो प्रकार की प्रतिक्रियायें दृष्टान्तो के माहौल के रूप में लेखक ने चित्रित की है। (15:1-2)। पापमुक्ति और रक्षा ज़रूरी है,। ऐसी धारण वाले नाकेदार और पापियों सहित साधारण जनता बडे चाव से ईसा से मिलती थी; तथा उन्होंने आपकी बातें सुनीं। इस पर वे खुश हुए। मगर जो अपने को ‘सन्त’ मानते थे, वे फरीसी और शास्त्री दूसरी ओर होते थे। इनकी प्रतिक्रियाओं को पृष्टभूमि में इन दृष्टान्तों का अर्थ समझें।

     भेड को ढूँढता चरवाहा   

     सुननेवालों को सुपरिचित दृष्टान्त है, भटकी हुई भेड को ढूँढने वाले चरवाहे का दृष्टान्त। झुण्ड से अलग भटकी हुई भेड निर्ज्जन स्थान में किसी खतरे में पड सकती है। या तो जंगली जीवों का शिकार होगा, नहीं तो कंटीली झाडी अथवा गड्ढे में फँस कर मर सकती है। एकजुट रहती भेडें सुरक्षित हैं। अत: उन्हें मरुभूमि में छोड कर भडकी हूई भेड को ढूँढना हर भले चरवाहे का काम है। जब  वह मिल जाती है तब उसके प्रति क्रोध नहीं बल्कि चरवाहे को हमदर्दी होती है । यही नहीं खोयीं हुई भेड को मिलने की खुशी भी अवाच्य है । भटकी रही, भयभीत थकी माँदी भेड को कन्धे में बिठा कर घर आता है और चरवाहा मित्रों को बुला कर खुशी मनाता है। यह तो सुननेवालों को समझ में आता चित्र हैं, मगर इस कथा का सार क्या है ?

       खुद ईसा ने इसे प्रकट किया है। भेडें और चरवाहा केवल प्रतीक मात्र हैं। भेडें दो प्रकार की हैं- झुण्ड से अलग हुए बिना, अनुशासित और सुरक्षित रहती भेडें, जो ईश्वर से ईमानदार रहते पवित्र व्यक्तियों का प्रतीक है। जो भटके हुए हैं, वे ईश्वरीय कानून का भंग करके ईश्वर से अलग होकर पाप-मार्ग में भटक कर सबकुछ खो कर नित्यनाश की प्रतीक्षा में रहते पापी हैं। नाकेदार और पापी नाम से जिन्हें बुलाया गया, उनका प्रतीक है, भटकी हुई भेड। जो झुण्ड के साथ हैं, वे हैं, फरीसी और शास्त्रियों के प्रतीक। आगे असाधारण और अप्रतीक्षित घोषणा हुई -‘मैं तुम से कहता हूँ, इसी प्रकार निन्यानब्बे धर्मियों कीं अपेक्षा, जिन्हें पश्चात्ताप की आवश्यकता नहीं, एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अघिक आनन्द मनाया जाएगा (लूकस 15:7)। यहाँ दो शब्द खास ध्यातव्य हैं -‘पश्चात्ताप करना’ पहला शब्द है।यह दो बार नज़र आता है। मोत्तानोयेयिल, मेत्तानोयिया (metanoeil-metanoia); यह इसका यूनानी मूल है। पश्चात्ताप माने किये-धरे पाप को गलत कार्य समझना है। उसके बारे में सोच कर दु:खी ठो जायें। मगर यूनानी मूल शब्द का ज़ोर अलग है।

        मन बदलाव-नया मनोभाव स्वीकारना मूल यूनानी शब्द का अर्थ है। यहाँ ध्यातव्य-कार्य पिछले दिनों में किये पाप को स्वीकारने की आदत नहीं, बल्कि नये जीवन-दर्शन और नयी जीवनशैली है। पश्चात्ताप करना-यह अनुवाद ज्यादा सार्थक होगा। किये-धरे पाप के प्रति दृ:खी हो कर पश्चात्ताप करें। उन्हें न दुहराने का फैसला लें । नयी जीवन शैली अपनाएँ- यही मनबदलाव है। इस प्रक्रिया की शुरूआत पाप चेतना है । जिन्हें अपने प्रति सही धारणा है, वही पश्चात्ताप कर पाता है। नहीं तो पश्चात्ताप की ज़रूरत न सूझेगी। यह ढोंग है। ईसा खिलाफ़ ईसा ने ज्यादा संघर्ष किया।

         स्वर्ग में खुशी- इसका मतलब क्या है? यहाँ दीर्घ व्याख्या की ज़रूरत नहीं। स्वर्ग ईश्वर का ही पर्याय है। मत्ती ने अपने सुसमाचार में ईश्वर के राज्य को स्वर्गराज्य बुलाया है। ईश्वर के प्रति ज्यादा आदर के कारण यहूदी ईश्वर के सही शब्द ‘याह्वे’ का उच्चारण नहीं करते। इसके बदले वे सर्वोच्च, स्वर्गस्थ आदि नाम कहते हैं। इस पृष्टभूमि में ईसा को सुननेवालों को कोई शक न होगा। पश्चातापी पापी के बारे में ईश्वर ज्यादा खुश होगा। क्योंकि ईश्वर चाहते हैं कि कोई भी नष्ट न हो जाये।

       खोया सिक्का ढूढने वाली मालकिन

        भेड की कहानी में मुख्य पात्र चरवाहा है तो सिक्के के दृष्टान्त में ढूँढने वाली मालकिन है, कथानायिका। लूकस की खासियत है कि वे स्त्रियों को पुरुषों को समान मुख्यता देते थे। खोया हुआ सिक्का उसे बहुमूल्य था । अन्य नौ सिक्के हाथ में है, किन्तु एक भी नष्ट न हो, इसे विचार से रहती मालकिन और चरवाहा स्वर्गस्थ पिता के प्रतीक हैं। खोये हुए मनुष्य को ढूँढने वाले ईश्वर का चित्र बाइबिल भर में नज़र आता है । अदन की वाटिका में छिपे रहे मनुष्य को ढूँढ कर खुद ईश्वर आये थे, वहाँ उनका अन्वेषण जारी है (उत्पत्ति 3:9)। पापी को ढूँढ कर ईश्वर की यात्रा, इस यात्रा का  आखिरी पडाव है, ईश्वर का मनुष्यावतार ।

              ईश्वर के चरित्र की खूबियों पर प्रस्तुत दृष्टान्त इशारा करते हैं। अपराधी को दूँढ कर दण्ड देने वाला कोई क्रूर न्यायमूर्ति नही है, ईश्वर । अपने प्रतिरूप वाले मनुष्यों में कोई भी नष्ट न हो जाये, वे चाहते हैं। भटके हुओं को सही रास्ते `पर लाने के लिए, कठिन से कठिन प्रयत्न भी वे करेंगे । इस वास्तविक ईश्वर का सही रूप है- कथा  बोलने वाले ईसा (कलो 1:15)। वे खुद पृथ्वी आये, इसका लक्ष्य रहा कि पापियों को ढूँढ कर पिता के घर में लाना। ईसा ने इसके बारे में कई बार कहा है।

          ह्रदय की गहराई से उठती आहें, पाप-बोध से उठती दीर्घ साँसें, ध्यान दें, सुनें, तुम्हें बुलाने वाले भले चरवाहे की आवाज़। ढूँढ कर आने वाले के पैरों की आहट सुनाई देती है। दण्ड देकर नाश करने के लिए नहीं। चोटों पर पट्टी बाँध कर कन्धे पर लाद कर घर जाने के लिए भला चरवाहा रूपी ईसा आता है।यह खुशी का स्रोत है । पश्चात्ताप का रास्ता बदलाव की शुरूआत भी है। खोए हुए व्यक्ति को ढूँढ कर लाने में हमारा ईश्वर तैयार हैं और इस में खुशी मनाते हैं। वे तुम्हें ढूँढ कर आते हैं।

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