Reincarnated with holy blood – the cross,

   पवित्र खून से पुनर्जन्म पाया- क्रूस,,

 लोकोद्धारक ईसा ने क्रूस पर जो खून बहाया, उससे क्रूस को पुनर्जन्म मिला। दुनिया के पापों को दूर करने वाले ईश्वर के मेमने रूपी ईसा को क्रूस पर चढाने के पहले क्रूस अशुद्ध साधन था। वह नीच मृत्यु, शाप और भयानक निन्दा का प्रतीक था। क्रूसी मृत्यु बडे अपराधी गुलामों और नीच वर्ग के व्यक्तियों को दी जाती कठिन सज़ा थी। यहूदियों ने इसे अभिशप्त माना। रोमी नागरिकों को क्रूसी मृत्यु से मुक्त करते थे। काठ पर जिसे फाँसी की सजा मिली है, वह ईश्वर से अभिशप्त हे (विधि 21:23); तत्कालीन संहिता में लिखा गया था। उस समय समाज और विधान में जो अभिशप्त और निद्य माना जाता था, उस क्रूस को यहूदी लोग अन्य दृष्टि से नहीं देख सकते थे। इस प्रकार निद्य और अभिशप्त क्रूस में ईसा ने अपना जीवन अर्पित किया। जो क्रूसी मृत्यु के लिए दंडित थे, वे क्रूसीकरण की जगह तक अपना क्रूस लेकर जाएँ, यह उस समय का नियम था। इसलिए भयंकर दु:ख-भोग की यात्रा-कूस ढोकर यात्रा  ईसा ने पूरी की, जो काल्वरी की ओर थी।
      येरुशालेम शहर के बाहर, मनुष्य को अपनी स्मरणाओं में भयानक रहा काल्वरी स्थित था। काल्वरी शब्द का अर्थ है, ‘खोपडी का स्थान’। क्रूस पर मरे व्यक्तियों की कई खांपडियाँ वहाँ होती थी। यही नहीं, दूर से देखें तो इस पहाडी का रूप खोपडी का सा था।
    ईसा की हँसी उडाने के लिए सैनिकों ने ईसा का वस्त्र उतारा और एक लाल चोंगा पहनाया सिर पर कांटों का मुकुट रखा, उन्हें खूब भारा, उनके मुख पर यूक दिया। क्रूसित व्यक्ति की स्थिति भयानक थी। क्रूस की कठोर वेदना न जाने, इस के लिए नशीला पानी दिया करता था।किन्तु इसा ने उसकी उपेक्षा की। इस प्रकार पवित्र लेख पूरे हुए, सबकुछ सौंप कर अपने आत्मा को सौंप कर प्राण’ चढायें। इस प्रकार क्रूस पर बहाये पवित्र रक्त के कारण क्रूस अनुग्रह, आशा और महत्व का चिह्न हो गया। क्रूस को पुनर्जन्म मिला । 
       क्रूस ईश्वर की शक्ति का प्रतीक बन गया, विश्यासियों पर असीम करुणा का कारण बन गया । बुलाये गये लोगों को क्रूस ईश्वर की शक्ति है। क्रूस ईश्वर का ज्ञान है (1 कुरि 1:24)। रक्षा और आशा की ओर ले जाने वाले ईश्वर-वचन के प्रकट होने का कारण ईसा की क्रूसी मृत्यु था। मृत्यु को क्रूसी मरण से परास्त करके ईसा ने क्रूस को पवित्र बनाया।
      क्रूस में लोकोद्धारक ईसा के जन्म से लेकर पूरा जीवन समाहित है। ईसा की जिन्दगी कष्टताओं और एतराजों से भरी थी। पापहीन रक्त हमेशा अपमानित हो जाता है। ईसा ने कदापि पाप नहीं किया, किन्तु पाप का अभाव मुश्किलातों के बढने का कारण हो गया। यह प्रभु ईसा को माहौल द्वारा दिया गया, निजी क्रूस था। ईसा ने अपने पवित्र रक्त से हमें मुक्त कराया। ‘आप लोग जानते हैं कि आप के पूर्वजों से चली आयी हुई निरर्थक जीवन-चर्या से आप का उद्धार सोने-चाँदी जैसी नश्वर चीज़ों की कीमत पर नहीं हुआ है। बल्कि एक निर्दोष तथा निष्कलंक मेमने अर्थात् मसीह के मूल्यवान रक्त की कीमत पर ’ (1 पेत्रु़. 1:18-19)। इस प्रकार क्रूस बुराई पर करुणा और पीडा-सहन से पायी जीत का चिह्न हो गया।
        ईश्वर का खूबसूरत मार्ग मनुष्य ने छोड दिया, तो ईश्वर ने उसके एक रास्ता तैयार किया, वह है क्रूस का मार्ग। मनुष्य के पाप के कारण स्वर्ग और भूमि अलग हूई, तब क्रूस उन्हें मिलाता है, मनुष्य-रक्षा शक्ति-स्रोत होकर स्थित हुई। क्रूस के बिना, भलाई नहीं, विशुद्धि नहीं। क्रूसित ईसा के हकदार हैं, ईसाई, सन्त सिप्रियन का प्रस्ताव है।
          जो क्रूस के मार्ग पर चलते हैं, वे ही अनन्त जीवन पा सकते हैं। ईसा ने कहा, ‘ जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करें और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले, (मत्ती 16:24)। क्रूस पर स्वर्गीय विकास क्री पूर्ति है। क्रूस पर मानसिक धीरता है, क्रूस पर आध्यात्मिक आनन्द, क्रूस पर पुण्य की पूर्णता है। क्रूस पर ही विशुद्धि की भरमार है।  क्रिस्तानुकरण में क्रूस के महत्व के बारे में लिखा है।
       ईसा के शरीर के अंग होने के नाते, हमारा मुख्य दायित्व है, ईसा का अनुगमन सब प्रकार से करें, उनके जैसे दर्द का अनुभव करें। हम उनकी सन्तानें हैं तो उनके हकदार भी हैं। क्योंकि हम उनके साथ एक समय महत्व पाने के लिए उनके साथ दु:ख सहते हैं।
        सन्तों ने दु:खों का स्वागत जोश के साथ किया, जो क्रूस के प्रति उनका प्रेम उज्ज्वल होने के कारण हुआ। जब उन्हें खूँखार जानवरों का शिकार बनाया गया, क्रूस पर लटकाया गया और मांस अग्नि में जल गया तब उनका जोश और प्रेम क्रूस के प्रति रहे।
       ईसा को जिस क्रूस पर चढाया गया, उसे ढूँढ निकालने के पीछे एक कहानी है। ईसा को जिस क्रूस पर चढाया, उसे ढूँढ निकालने की तीव्र इच्छा और विश्वास-तीक्षणता ने रानी हेलेना को फिलिस्तीन की यात्रा की प्रेरणा दी। जब कालवरी के कूडे-कचरे हटाये तब तीन क्रूस नज़र आये। इनमें ईसा को किस क्रूस पर चढाया, किन पर चोरों को लटकाया गया, यह परखना आसान न था। उस समय एक जड लेते हुए जत्था आगे बढ रहा था। तुरन्त तत्कालीन येरुशालेम बिशप रहे सन्त मक्कारियूस को एक विचार हुआ। निकाले गये क्रूसों का जड पर स्पर्श कराना, ईसा के क्रूस का स्पर्श होने पर निर्जीव शरीर को प्राण वापस मिलेंगे। उन्होंने इस प्रकार विश्वास के साथ प्रार्थना की और क्रूस को जड से लगाया, तीसरे क्रूस के स्पर्श से जड को प्राण मिले। उस समय जो भी वहाँ जमा थे, उन सबों ने सन्त हेलेना और सन्त मक्कारियूस के साथ क्रूस की वन्दना की। उन सबों ने वहाँ के मुख्य मन्दिर में साज-बाज और भक्ति के साथ उस क्रूस की स्थापना की। यह सितंबर 14 की बात थी। तब से लेकर सितंबर 14 को क्रूस की वन्दना का पर्व मनाया जाने लगा। इसके बाद पवित्र क्रूस के प्रति भक्ति और पूजा कलीसिया में काफी फैल गयी।
              क्रूस पर हमारी रक्षा है मगर क्रिस्तानुकरण में लिखा है कि ईसा का क्रूस ढोने वाले बहुत कम हैं। ईसा के स्वर्गराज्य को प्यार करने वाले अनेक है, मगर उनकी सलीब ढोने में तैयार व्यक्ति कम हैं। पोप बेनडिक्ट 16-वें ने कहा: दुनिया के सर्वशक्त और ज्ञानी होने के बावजूद भी, प्रेम की कमज़ोरी के कारण ईसा विनम्रता के साथ हमारे लिए मरे और उत्थित हुए। उनके प्रति खुली और दृष्टव्य अधीनता की घोषणा क्रूस के चिह्न लगाने से हम कर रहे हैं।

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