Should become disciples of Jesus

 हर मनुष्य ईसा शिष्य बनने के लिए बुलाया गया है । क्योंकि ईसा – मार्ग स्वर्गोन्मुखी है । स्वर्गराज्य स्थाई रूप से पाने की जीवनशैली ईसा ने अपने जीवन के आदशों के ज़रिए हमें दिखायी हैं । जो अपना अनुगमन करना चाहते हैं, उनसे ईसा क्या चाहते हैं, यह दिखाने में समर्थ वचन तभी बोले गये, जब कि ईसा ने अपने शिष्यों को चुन लिया । यह ईसा के मार्ग पर चलने वालों को उनका दिया मार्ग-निर्देश है । ’ईसा ने उनमें से बारह को नियुक्त किया, जिससे वे लोग उनके साथ रहें और वह उन्हें अपदूतों को निकालने का अधिकार देकर सुसमाचार का प्रचार करने भेज सके’ ( मारकुस 3:14-15)।
      ईसा अपने जीवन से हमें जो कुछ पढाते हैं, वे जीवन पाठ शायद हमारे जीवन माहौल, अनुभव और युक्ति के लायक नहीं होंगे । शायद हमें लगेगा कि अमुक कार्य मूर्खता है, युक्ति के योग्य नहीं, अतार्किक है। मगर चाहे मनुष्य न समझ सके, दूसरों के सामने हम परिहास का विषय बने तथापि ईसा ने कहा है, अंत उन्हें पूरा करना ईसा शिष्य का कर्तव्य है ! ज़रूर वह सफल होगा। कैसे सिमयोन ईसा का शिष्य बन गया,ज़रा देखें 1 गनेसरत तालाब में रात भर कठिन प्रयत्न करने’ के बावजूद भी पेत्रुस को कुछ भी नहीं निला, उन्होंने निराश होकर जाल घोकर काम खत्म करना चाह । तब ईसा ने उनसे कहा, नाव गहरे पानी में ले चलो (लूकस 5:4) । मछुआरे सिमयोन को मालूम था कि आगे का काम निरर्थक है, फिर भी सिमओन का जवाब इस प्रकार था, गुरुवर ! रात भर मेहनत करने पर भी हम कुछ नहीं पकड सके, परन्तु आप के कहने पर मैं जाल डालूँगा (मत्ती 5:5) । उन्हें जाल भर मछली मिली। इस घटना के अन्त में इस प्रकार लिखा गया है, ‘वे नावों को किनारे लगा कर और सब कुछ छोड कर ईसा के पीछे हो लिये’ ।
      एक व्यक्ति पूर्णत: ईसा का हो जायें, यही शिष्यत्व है । एक व्यक्ति शिष्य बन जाता है तो शायद गुरू के सारे रास्ते’ उसे ज्ञात न होंगे। कुछ नासमझी और असंभावना के सामने गुरू पर आस्था रखता है, और उनका अनुसरण करता है ।  उन्होंने अज्ञान की वेला में ईसा का अनुगमन करने का फैसला लिया, फिर अन्त में वे शिष्यत्व की पूर्णता में ज्ञान से  भर उठे । अज्ञानियों को ईसा की ओर खींचने वाले पिता  ईश्वर हैँ ।  कोई  मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक’ कि पिता जिसने मुझे भेजा, उसे आकर्षित नही करता‘ ‘ (योहन 6:44) । जिन्होंने ईसा-मार्ग अपनाया, उन्हें सभी काम  पवित्र आत्मा पढाता है । ’वह सहायक, वह पवित्र आत्मा  जिसे पिता मेरे नाम पर भेजेगा, तुम्हें सबकुछ समझा देगा । मेंने तुम्हें जो कुछ बताया, वह उसका स्मरण दिलायेगा (योहन 14:26) ।
      ईसा ने अपने शिष्यों को चुना तो अपने  मन में जो लक्ष्य रखा था, वह लक्ष्य हर ईसाई से वे चाहते हैं  (मारकुस 3:13-15)।

    1. शिष्य ईसा के साथ रहे

      अपने प्रभु ईश्वर, को अपने सारे ह्रदय अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करों  (मत्ती 22:37) । यह पूर्णत्त: ईसा के साथ रहना है ।शिष्य ईश्वर को प्रथम स्थान दें, इसके लिएं अपना सबकुछ छोड दें । यदि कोई मेरे पास आता है और अपने माता-पिता, पत्नी, सन्तान, भाई-बहनें और यहाँ तक कि अपने जीवन से बैर नहीं करता, तो वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता (लूकस 14:26) । ईसा में अपना प्रेम पूर्ण हो, इसकेलिए शिष्यों ने सबकुछ छोड दिया, फिर वे हमेशा ईसा के साथ रहे, फिर ईसा के प्रेम की भरमार  में अपने माता-पिता, पत्नी, सन्तान और भाई-बहन को,अपन प्राणों को भी त्याग करें  । सन्तों का जीवन हमें यह पाठ देता है । सन्त मदरतेरेसा ने ईसा प्रेम के लिए सबकुछ खो  दिया । ईसा के प्रेम के प्रति सबों को प्यार किया  ।

    2. ईश्वर के राज्य की घोषणा करना

       खुद जिस ईश्वर-प्रेम का अनुभव किया, उसकी घोषणा करना ईसा-शिष्य का कर्तव्य है । ‘ संसार के कोने कोने में जा कर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ’ (मारकुस 16:15) । केवल कथनी से मात्र नहीं, बल्कि जीवन साक्ष्य से हम सुसमाचार की घोषणा करें । जब ईसा के प्यार में रहे तब जो आध्यात्मिक और भौतिक खुशी, नित्यरक्षा के बारे में दृढता, दु:खों और जीवन संकटों के प्रति मनोभाव, ईसा से जुडे रहते वक्त भोगी सारी भलाइयों को अन्य व्यक्तियों के सामने हम प्रकट करें। यह ईसा के प्रेम की ओंर परायों को आकर्षित करने का मार्ग हे । एक सच्चे ईसाई का सबसे प्रेरणाप्रद भाषण उसका अपना जीवन है । सन्त फ्रान्सीस अस्सीसि हमें ज्यादा पसंदीदा सन्त इसलिए है कि उन्होंने ईसा प्रेम से भरे वक्त जो जीवन शैली अपनायी, जो आदर्श दिखाया, उनके ज़रिए दिया सन्देश हे ।

   3. शैतान को निकालना

      इस दुनिया से जुडे रहने वाला शरीर मनुष्य को है, हर ईसाई (शिष्य) को शैतान के विरुद्ध संघर्ष करना है । बर्फ से भरी सडक से आगे बढना है तो रास्ते से बर्फ के टुकडों को हटा देना है । हमारे हर कदम में शैतान परीक्षायें ओंर उलझनों लेकर आ जायेगा । हम हर पल इस शैतान को पराजित करके आगे बढें । इसके लिए ईश्वर ने हमें काफी शक्ति दी है । ‘ जो तुममें है, वह उससे महान है, जो संसार में है’ (1 योहन 4:4) ।
    शिष्यत्व के मूल्य के बारे में ईसा एक सवाल उठाते हैं-अथवा कौन ऐसा राजा होगा, जो दूसरे राजा से युद्ध करने जाता हो और पहले बैठ कर यह विचार न करें कि जो बीस हजार की फोज के साथ उस पर चढा आ रहा है, क्या वह ‘दस हजार कीं  फौज से उसका सामना’कर सकता है? (लूकस 14:31)। शेतान के खिलाफ संघर्ष करने की शक्ति हमें है, यह विचार हमें हो । यदि कोई कमजोरी है तो उसे दुर करें। शैतान को  निकालने का सशक्त मार्ग प्रार्थना और उपवास है । ‘ प्रार्थना  और उपवास के सिवा और किसी उपाय से यह जाति नृहीं निकाली जा सकती’ (मारकुस 9:29) ।

     4. शिष्यों की भी परीक्षा होगी

      सजीव शिष्यत्व की ज़रूर परीक्षा होगी। भलाई में दृढ रहे तो भी हमें परीक्षायें और दु:ख वारदातें होती हैं,तो हम  जितनी गहराई में ईसा से जुडे हुए हें इसकी परीक्षा हो रही है। वारदातों का दु:खपूर्ण समचार हमें सुनना पडेगा। कुछ भटकावों के कारण परिहास का पात्र बनना पडेगा । कभी ईसाई हो कर जीने के प्रति सोच कर निराश होना पडेगा । परीक्षा के वक्त हम पराजय खायें तो परीक्षक शैतान हमारी पराजय के बारे में अनेकों के परिहास के ज़रिए हमें भटकाने का यत्न करेगा। तुम में से ऐसा कौन होगा, जो मीनार बनवाना चाहे और पहले बैठ कर खर्च का हिसाब न लगाये और यह न देखे कि क्या उसे पूरा करने की पूँजी उसके पास है? (लूकसा 14:28) । जब काम को पूरा  कर पाते तब जो मालिक परिहास का पात्र बन जाता हे, वेसे है, पूर्णता न पाने वाला शिष्य भी।
          शिष्यत्व की पूर्णता की ओर हमें पवित्र आत्मा ले जाता हैं । पवित्र आत्मा की मदद के लिए माँगते हुए शिष्यत्व पाने का प्रयत्न करें ।

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