Sin Confession And Holy Mass

      क्या पाप-कबूली संस्कार पाये बिना परमप्रसाद की रोटी स्वीकार कर सकते हैं ?

          क्या पाप-कबूली का संस्कार पाये बिना परमप्रसाद की रोटी पा सकते हे? इस सवालं के पीछे तीन प्रश्न होते हैं ।
1. पाप कबूली के स्वीकार के बिना परमप्रसाद की रोटी पा सकते हैं? 
2. पापरहित अवस्था में क्या पाप-कबूलीं का संस्कार करना चाहिए ।
3. पवित्र मिस्सा में पापों की क्षमा की जाती है 
    तो फिर इसके पहले पाप-कबूली संस्कार की क्या ज़रूरत हैं? इन सवालों का उत्तर कलीसिया के उपदेशों के तहत खास कर न्नेंतोस विश्वसभा के अध्ययन के प्रकाश में समझें । विश्वसभा की सीख का वर्णन यहाँ तो जगह की कमी के कारण संभव नहीं, अत: सीधे सवाल-जवाब की ओर आता हूँ । 

      1. पाप-कबूली के संस्कार को कई व्यक्ति पवित्र रोटी स्वीकरण की तैयारी होकर ही समझ बेठे हैँ । मगर अन्य धर्म संस्कारों की भाँति यह भी वरप्रसांदों की पूर्णता से युक्त है । पापमुक्ति का वरप्रसाद दिया जाता है, अत: पवित्र मिस्सा के स्वीकरण के लिए विश्वासी को यह योग्य बना पाता हे । यह केवल तैयारी का कर्म मात्र नहीं, जैसे कि कईं समझ बेठे हैं । जो वरप्रसादपूर्ण है, उसके ज़रूर पाप-कबूली के बिना पवित्र भोज्य स्वीकार करने में कोई रुकावट नही । किन्तु परमप्नसाद की रोटी स्वीकरण के लिए पाँच शर्त हैं-  1. वरप्रसादावस्था में रहना   2. आत्मामारू पापों के लिए पाप-कबूली संस्कार के ज़रिए माफी पाना 3. पवित्र मिस्सा के वस्तु-भेद (रोटी और अंगूरी ईसा के शरीर-रक्त के रूप में बदलते हैं) पर विश्वास करें । 4. मिस्सा स्वीकरण के पहले कम-से कम एक घण्टा उपवास लें  5. कलीसिया के मेल-मिलाप में सदस्यता पाये । ये हैं पाँच शतें । 
        2. पवित्र परमप्नसाद की रोटी पाने के लिए पाप-कबूली का संस्कार लेना हैं?यह-सवाल लायक हैं । जो व्यक्ति आत्मामारू पाप कर चुका हैं, वह पापमुक्ति पा कर ही परमप्नसाद की रोटी स्वीकारे । यह कलीसिया का कानून है । जान-बूझ कर हत्या, गर्भपात, स्ववर्गरति, व्यभिचार आदि पाप आत्मामारू हैं । आत्मामारू पापों की लंबी सूचि 1 कुरि 6:9-10, गला 5:19-21 इन्हीं वचन भागों में उपलब्ध हैं । पवित्र मिस्सा पवित्र जनता के लिए ही है । यह रवैया कलीसिया की परंपरा के आरंभ से लेकर चालू था । सत्त पौलुस ने चेतावनी दी है कि जो अयोग्यता से परमप्रसाद की रोटी स्वीकारते हैं वें रोगी और मृतक हो जायेंगे! जो पवित्र हैं, वे परमप्ररसाद की रोटी लेने आगे आयें।
       अशुद्ध व्यक्ति पश्चात्ताप करें यह डिडाक्के की सीख है (DID 10) । यह प्रस्तूत कानून को साधू बनाता है। किन्तु जो मरणासत्र तथा जो पाप-कबूली का संस्कार पाने की सुविधा में नहीं जीते हैं. उन्हें एक शर्त पर परमप्रसाद की रोटी देते हैं कि वे जब कभी पाप-कबूत्ती के योग्य बनेंगे तव यह करेंगे. ऐसी प्रतिज्ञा करनी चाहिए। पाप के प्रति पश्चात्ताप करने वालों को भी यह रोटी स्वीकारने की अनुमति है । परचात्ताप में ज़ल्दी-से-जल्दी पाप-कबूली का संस्कार पाने का दृढ संकल्प है । पाप-कबूली के बिना परमप्रसाद की रोटी क्या स्वीकार सकते हैं? इस सेवाल पाप-कबूली तथा पश्चात्ताप के आपसी संबन्ध को भूला जाता है । 
3. जो पापरहित हैँ, वे क्या पाप-कबूली का संस्कार पाएँ? यह सवाल आध्यात्मिक यथार्थ के परे केवल युक्ति पर आधारित है। सबों ने पाप किया और सब ईश्वर कीं महिमा से वंचित किए गये (रोमि 3:23) । धर्मी व्यक्ति भी दिन भर में सात बार पाप करता है, ऐसे वचन पाप की सार्वत्रिकता का परिचायक है । कर्तप्रार्थना में हम प्रार्थना करते हैँ कि प्रभु! हमारे पापों को क्षमा करें (लूकस 11 :4) । ईसा ने ही प्रस्तुत प्रार्थना हमें पढायी है। जो यह सोचते हैं कि पाप नहीं, वे कर्तप्रार्थना ठीक से नहीँ कर पाते। जैसे स्वर्गस्थ पिता परिपूर्ण हैं. वैसे परिपूर्ण हो जाओ (मत्ती 6:48)। इसके लिए हर विश्वासी बुलाया गया है । स्वर्गस्थ पिता की परिपूर्णता तक कोई पहुँच चुका है. यह दावा नहीं कर सकते। स्वर्गस्थ पिता की परिपूर्णता से हमारी तुलना करें तो तब समझ में आएगा कि हममें से हर कोई पापियों में प्रथम है। यह अवचेतना सन्त पौलुस सहित अनेकों को होती थीं। यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं है । यदि हम कहते हैं कि हमने पाप नहीं किया है. तो हम उसे (ईसा को) झूठा सिद्ध करते हैं (1 योहन 8:10) । प्रेरित के कहने का मतलब भी यही है । पाप का अभाव नहीं, बल्कि पाप चेतना उनमे नहीं, यही सच है। शायद आत्मामारू पाप नहीं होंगे फिर भी हमारे प्रलोभनों और पाप प्रेरणाओं को खुल कर बतायें और ईश्वर के सामने पाप- कबूली का संस्कार पाएँ तो हमें वरप्रसाद मिलेगा ! ऐसे पाप-कबूली संस्कार चार प्रकार से हमारे आध्यात्मिक विकास का कारण बनेंगे, सार्वत्रिक धर्माध्ययन ग्रन्य पढाता है  1 . अन्त:करण के सटीक रूपायन का मददगार है! 2. हमारी पापवासनाओं से संघर्ष कर सकते हैं । 3. ईसा से प्रदत्त सौख्य के योग्य बन जाते हैं तथा आध्यात्मिक जीवन में बढ सकते हैं 4. स्वर्गस्थ पिता की भाँति करुणायुक्त हो जाने के लिए (लूकस 6:60) हमें समर्थ बनाते हैं (ccc 1458) । कर्मपापों के अन्धेरे को दुर करना ही नहीं, हमारी भलाई की प्रकाश किरणों को बढाने में भी यह संस्कार सहायक है। 

        4. पवित्र मिस्सा में पापमुक्ति ज़रूर मिलती है । यह सच है। यह पापमुक्ति के लिए बहाया जाता खून हैं- यह स्थापक वचन पवित्र मिस्सा की पापमुक्ति की आदत का सूचक है। जैसे भोजन से शारीरिक थकान दूर होती है वैसे आध्यात्मिक भोजन रूपी पवित्र रोटी आत्मा की थकान रूपी पाप को हरता है (ccc 1394) । पवित्र मिस्सा में लघु पापों की ही मुक्ति मिलती है, न्नेंत्तोस विश्वसभा ने पढाया है (DS1638) । आत्मामारू पापों की क्षमा पाप-कबूली संस्कार से ही मिलती है। ईसा के क्रूस की मुक्तिदायक बलि का दुहराव है, पवित्र मिस्सा ,अत: सभी पापों की क्षमा मिलेगी, ऐसा तर्क ठीक नहीं। हर घर्मसंस्कार के वरप्रसादों का स्रोत क्रूसी बलि ही है ।
         विभिन्न धर्मसंस्कारों के फल भी विमित्र हैं। हर धर्मसंस्कार के वरप्रसादों का मौलिक स्वभाव है । उदारण के लिए विवाह से मिलते वरप्रसादों से मित्र वरप्रसाद पवित्र पुरोहिताई के संस्कार से मिलते हैं। बपतिस्मा, पाप-कबूली, पवित्र मिस्सा , रोगशान्ति ये संस्कार पापमोचक हैं । बपतिस्मा पाया व्यक्ति पाप-कबूली का संस्कार पाये तो आत्मामारू पापों की क्षमा मिलेगी (पाप-कबूली के योग्य अवसर है तो) पाप-कबूली का संस्कार के परमप्रसाद ही आत्मामारू पापों के दुष्फलों को दूर कर सकता है । अत: जिन्होंने आत्मा-मारू पाप किया है, वे पाप-कबूली का संस्कार पाये बिना पवित्र परमप्रसाद की रोटी नहीं स्वीकारें। ऐसा नहीं हैं तो वह कलीसिया के विरुद्ध काम है, जिसे सुधारना है!

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