The Mercy of God Jesus

 
God

 ईश्वर की करूणा ,,,,

   इसा 54: 1-10 में ईश्वर की करुणा के बारे में ब्योरा है। यहॉ हम लोग ऐसे ईश्वर-प्रेम के बारे में पढते है, जो असहाय व्यक्तियों और बन्धुहीन व्यक्तियों का प्रेम करता है। जवानी में उपेक्षित होकर दु:खी रहती पत्नी की भाँति दु:खी तुम्हें ईश्वर बुलाते हैं । परित्यक्ता स्री की भाँति दु:ख की मारी! प्रभु तुझे वापस बुलाता  है । . . . मैं ने थोडी ही देर के लिए तुझे छोडा था, अब मैं तरस खा कर तुझे अपने यहाँ ले जाऊँगा। मै क्रोध के आवेश में क्षण भर तुझ से मुँह फेर लिया था,अब मैं अनन्त प्रेम से तुम पर दया करता रहूँगा यह तेरे ३ उद्धारकर्ता ईश्वर का कथन है (इसा (54:6-8)।
     पुराने विधान में पिता ईश्वर की करुणा के बारे में बताने के लिए हेसत  (Hesed) नामक शब्द का प्रयोग किया गया हैं । ईश्वर की करुणा के लिए प्रयुक्त और एक शब्द है रहमिम् (Rechamin) माँ के  गर्भाशय से यह शब्द रूपारित है । माँ अपने गर्भाशय से पैदा हुए बच्चों के प्रति दिखाती करुणा प्रस्तुत शब्द प्रकट करता है । क्या स्री अपना दुधमुँहा बच्चा भुला सकती है? क्या वह अपनी गोद के पुत्र पर तरस नहीं खाएगी? यदि वह भुला भी दे, तो भी मैं तुम्हें कभी नहीं भुलाऊँगा (इसा 49: 15)।
     पिता ईश्वर और ईसा मसीह की करुणा के लिए प्रयुक्त शब्द एलेयोस‘ (Eleos) है । ’चू जाता तेल’ नामक यूनानी शब्द से यह शब्द बना है। पिता ईश्वर की करुणा का अनुभव मनुष्य को खूब मिला, इसका ध्यातव्य अवसर ईसा की क्रूसी मृत्यु है। जब ईसा क्रूस पर लटके हुए थे, एक सैनिक ने उसकी बगल में भाला मारा, और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला’ (योहन 19:34) । इस धटना को कलीसिया दो धर्म-संस्कारों से मिला कर देखती है – पानी बपतिस्मा का और खून पवित्र मिस्सा का प्रतीक है। सन्त फोस्तीना ने लिखा, ” ईसा की छाती के घाव से ईश्वरीय करुणा का स्रोत फूट पडा (NBIII 1182)। 
     नये विधान के लैटिन अनुवाद में करुणा के लिए प्रयुक्त शब्द है, मिसरिक्कोरदिया (Misericordia) इसका शब्दिक अर्थ है, ह्रदय का दु:ख। मिसारिकोरदिया का भाव है – किसी के दर्द को समझते वक्त उसके साथ ह्रदय की वेदना बाँट ले, उसको सान्त्वना देने के लिये हमदर्दी के साथ काम करें।
     पुराने विधान में ईश्वर की करुणा की उज्ज्वल प्रकाशना तब मिलती है जब कि उन्होंने मिश्रदेश की गुलामी से इस्राएलियों को छुडाया । इसे पास्का बुलाते हैं। नये विधान का पास्का ईसा के क्रूसी मरण के जरिए मनुष्यवर्ग को मिला। ‘पास्का‘ शब्द का अर्थ है ‘पार जाना’। इश्वर की पूजा के लिए जनता को छुडायें, मूसा ने फिराऊन से कहा (निर्ग 9:13, 10:3)। सही आराधना की शर्त है, मानवहृदय पापमुक्त हो जाये।
         पापमुक्त जीवन संभव है, ईसा की क्रूसी मृत्यु यह व्यक्त करता है। ईसा के क्रूस का बलि-समर्पण पास्का मेमने की जगह अपने को चढा कर ईसा ने किया । जब यहूदी पुराने विधान में कहे अनुसार पास्का पर्व मनाते थे तब ईसा ने पाप प्रायश्तित्त बलि के रूप में पवित्र मिस्सा की स्थापना की (लूकस 22:19) । ईसा दुनिया के पाप का नाश करता ईश्वर का मेमना है, योहन बपतिस्ता ने ईसा के बारे में कहा, देखो, ईश्वर का मेमना, जो संसार का पाप हरता है (योहन 1:29) । शैतान के कर्मों को हटा कर (1 योहन 3:8), पापमुक्त जीवन बिताने के लिए मनुष्य वर्ग को पढाने के लिए ईसा क्रूस पर मरे।
    सन्त पौलुस ने लिखा, हम पापी ही थे, जब मसीह हमारे लिए मर गये थे, इससे ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है (रोमि 5:8) । ईसा की क्रूसी मृत्यु के ज़रिए हम न्याय और करुणा का अन्तर समझते हेैं । न्याय की मांग है कि मैं अपने पापों का प्रायश्तित्त करूँ जो उसकी गंभीरता के तौर पर हो । मगर ईसा ने मेरे पापों का प्रायश्तित्त किया, यही ईश्वरीय करुणा है ।
         पिता ईश्वर ने ईसा के ज़रिए संसार को करुणा दी। ईश्वरीय करुणा के फलस्वरूप मिलती पाप-माफ़ी के बारे में केवल एक ही धर्म- ईसाई धर्म बताता है ।
         ईश्वर की करुणा केवल पाप-क्षमा मात्र नहीं, स्वर्ग के भाग्य का वादा देती है । धन्य है ईश्वर हमारे प्रभु ईसा मसीह के पिता! मृतकों में से ईसा मसीह के पुनरुत्थान द्वारा उसने अपनी महती दया से हमें जीवन्त आशा से परिपूर्ण नवजीवन प्रदान किया । आप लोगों को जो विरासत स्वर्ग में रखी हुई है, वह अक्षय, अदूषित तथा अविनाशी है (1 पेत्रु. 1:3-4) ।
       सन्त पौलुस ने अपने को ईश्वर से मिली सबसे बडी करुणा के रू प में अपने को मिली क्षमा को माना है । ईश्वरीय करुणा का बुनियादी पक्ष पाप-छमा है । मैं पहले ईश-निन्दक, अत्याचारी और अन्यायी था; किन्तु मुझ पर दया की गयी है, क्योंकि अविश्वास के कारण मैं यह नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूँ । मुझे हमारे प्रभु का अनुग्रह प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुआ और साथ ही वह विश्वास और प्रेम भी, जो हमें ईसा मसीह द्वारा मिलता है। यह कथन सुनिश्चित और नितान्त विश्वसनीय है कि ईसा मसीह पापियों को बचाने के लिए संसार में आये, और उन में सर्वप्रथम मैं हूँ । मुझ पर इसिलिए दया की गयी है कि ईसा मसीह सब से पहले मुझ में अपनी सम्पूर्ण सहनशीलता प्रदर्शित करें और उन लोगों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करें, जो अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए विश्यास करेंगे (1 तिमथी 1:13-16) ।
         पुराने विधान में ईश्वर की करुणा कैसी थी, यह समझने का सही मार्ग ईसा मसीह के जीवन के बारे में खूब पढना पढना है। ईसा मसीह अदृश्य ईश्वर का प्रतिरूप और समस्त सृष्टि के
पहलौठे हैं (कलो 1:15) । ईसा ने कहा, जो मुझे देखता है, वह पिता को देखता है । मैं और पिता एक है (योहन 10:30)।
        सन्त पेत्रुस ने ईसा की उपेक्षा खुल्लमखुल्ला तीन बार की; ईसा ने पेत्रुस को चेतावनी दी थी कि ध्यान दो । किन्तु पेत्रुस ऐसा नहीं कर पाये । जब पेत्रुस ने जाना कि ईसा पुनर्जीवित हुए, तब वे ईसा का सामना करने के धैर्य के अभाव में येरुशालेम छोड कर अपना गाँव गलीली गये । उसने सोचा कि अपना पहला धन्धा करके जीविका चलायें। पेत्रुस को मालूम था कि ईसा ने उनसे पत्थर-सा विश्वास मांगा था । किन्तु अब पाप के कारण  उस नाम के योग्य नहीं बन पाये । पेत्रुस ने स्थापना करने के लिए ईसा तैयार नहीं से होंगे । किन्तु उस समय ईसा गलीली झील के किनारे पेत्रुस को ढूँढ कर आये।
          ईसा ने वहाँ जो हमदर्दी दिखाया वह ईसा की करुणा ही रही। रात भर कठिन मेहनत करने के बावजूद उन्ही मछली नही मिली थी, ईसा ने उन्हें चमत्कारी ढंग से मछली पकडने की मदद की । अपने को शिष्यत्व देने आते वक्त ईसा ने मछली पकडने के बारे में कही था, जिसकी याद उन्हें हुई होगी । मछली लिये तट पर आए तो पेत्रुस ने तट पर अग्नि देखी जिसे ईश्वर ने जलाया था । कुछ दिनों के पहले आग के सामने बैठ कर पेत्रुस ने ईसा की कठोर उपेक्षा की थी, उसकी याद उन्हें हुई होगी। वहाँ ईसा ने पेत्रुस को तीन बार विश्वास और प्रेम को प्रकट करने का अवसर दिया । ईसा ने पेत्रुस से पूछा, सिमोन योहन के पुत्र, क्या इनकी अपेक्षा तुम मुझे अधिक प्यार करते हो? उसने उन्हें उत्तर दिया, जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आपको प्यार करता हूँ’ । उन्होंने पेत्रुस से कहा, मेरे मेमनों को चराओ (योहन 21:15) । अपनी प्रतीक्षा से ज्यादा करुणा और कृपा पेत्रुस को ईसा ने दी। ईश्वरीय करुणा के बारे में खूब जानकारी यह घटना देती है ।
ईश्वर की करुणा से पेत्रुस को ऐसा अनुभव हुआ कि मानो नया बपतिस्ता मिला हो । जो ईश्वर की करुणा से संपन्न है,वह आगे चाल कर नयी ऊर्ज्जा पा कर सुसामाचार का साछ्य  वेला तायगपूर्वक देता है। पेत्रुस ईसा के लिए मरने को तैयार हुए,इसके पीछे ईसा करुणा की प्रेरणा और शक्ति होती थी।
       सन्त पौलुस ने लिखा कि ईश्वरीय करुणा का लक्ष्य क्या है? ” क्या तुम ईश्वर की असीम दयालुता, सहनशीलता और धैर्य का तिरस्कार करते और यह नहीं समझते कि ईश्वर की दयालुता तुम्हें पश्चात्ताप की और ले जाना चाहती है? (रोमि 2:4)। ईश्वर पापियों के प्रति करुणा दिखाते हैं तो वह बार-बार पाप करने के लिए नहीं, ‘क्षमा पाने की आशा में पाप-पर-पाप मत करते जाओ'(प्रवक्ता 5:5) । सन्त पौलुस फिर कहते हैं वह प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों का फल देगा (रोमि 2:6)। जिन्हें ईश्वर की करुणा प्राप्त है, वे पेत्रुस और पौलुस का आदर्श अपना कर जीवन बितायें।

        कौन ईश्वरीय करुणा के योग्य हैं?

     ईसा के क्रूस की मृत्यु के ज़रिए दी जाती करुणा (विश्वास के ज़रिए मिलती मुफ्त पाप क्षमा) हर एक का हक हैं। सन्त पौलुस ने लिखा, जो प्रभु के नाम की दुहाई देगा, उसे मुक्ति प्राप्त होगी (रोमि 10:13) ।
      पाप-क्षमा की कृपा हर एक का हक हैं । मगर जीवन में अलग-अलग हैसियत और दायित्व दिये जाते है। दान और सेवा में वैविध्य है (1 कुरि 12:4-5) । एक शरीर में जैसै कई अंग है, वैसे (1 कुरि 12:14) । ईश्वर के बारे में हम पढते हैं-मैं जिस पर दया करना चाहुँगा उसी पर दया करूँगा, और जिस पर तरस खाना चाहुँगा उसी पर तरस खाऊँगा (रोमि 9:15)! ईश्वर जिस पर चाहे, दया करता है (रोमि (9:18)। पाप-क्षमा के ज़रिए होती करुणा के बारे में यहाँ सूचना नहीं। विभिन्न पदं और दायित्व कलीसिया में दिया जाता हैं, उसके निर्वहण को लेकर यह बताया गया । “उन्होंने कुछ लोगों को प्रेरित कुछ को नबी कुछ को सुसमाचार-प्रचारक, और कुछ को चरवाहे तथा आचार्य होने का वरदान दिया (एेफ 4:11)। अपनी असावधानी के कारण कई व्यक्तियों को दिया गया पद खोना पडा है।आप लोगों में न तो कोई व्यभिचारी हो और न एसाव के सदृश कोई नास्तिक, जिसने एक ही भोजन के लिए अपने पहलौठे का स्थान बेच दिया (इब्रां 12:16) ।
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      ईश्वर से करुणाप्राप्त व्यक्ति क्या करें?

   ईसा ने पढाया: अपने स्वर्गिक पिता जैसे दयालू बनो” (लूकस 6:36) । सन्त पौलुस ने कहा, जिस तरह ईश्वर ने मसीह के कारण आप लोगों को क्षमा कर दिया, उसी तरह आप ही एक दूसरे को क्षमा करें (एफे. 4:32)। ईसा ने एक दृष्टान्त से पढाया, ईश्वर से ईसा की पाप प्रायश्चित्त बलि के ज़रिए अनन्त करुणा से लैस व्यक्ति अन्य मनुष्यों के माँगने पर करुणा का निषेध न करें । जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की थी, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सहसेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी? (मत्ती 18:33) । हमारे पास जो भी है, संपत्ति, स्वास्थ्य, पद, कीर्ति आदि सब ईश्वर का मुफ्त दान है (मत्ती 10:8) । सन्त पौलुस पूछता है: ‘ आप के पास क्या है, जो आपको न दिया गया है इस तरह आप लोगों की समृद्धि उनकी तंगी दूर करेगी, जिससे किसी दिन उनकी समृद्धि आप की तंगी दूर कर दे और इस तरह बराबरी हो जाये (2 कुरिं 8 : 14)। यह ईश्वरीय इच्छा है । (1 कुरि 4:7) । उन्हें योग्य व्यक्तियों को विवेक के साथ न बाँटना ईसाई करुणा के खिलाफ है यदि आपको सबकुछ दान में मिला है तो इस पर क्यों गर्व करते हो ।

     ईश्वर की करुणा का कारण न्याय है

  ईसा की क्रूसी मृत्यु के न्यायपूर्ण कर्म के फलस्वरूप पापक्षमा विश्वास के ज़रिए करुणा के रूप में मनुष्य को प्राप्त है । न्याय के कानून के अनुसार, मैं जो दण्ड भोगूँ, उसे ईसा ने मेरे बदले स्वीकार कर लिया, ईसा के क्रूस में पापी लोग न्याय के नाम पर अपने को योग्य दण्ड को खुद भुगतने वाले ईसा को है । सन्त पेत्रुस ने लिखा, ” तुम्हें मोल देकर प्रभु ने खरीदा है,  उन्हें नहीं छोडें’। सन्त पौलुस कहते हैं’ आप लोग की मत पर खरीदे गये हैं (1 कुरि 6:20) करुणा प्राप्त व्यक्ति अपने शरीर से ईश्वर को महत्व दें (1 कुरि 6:20) । अर्थात् पाप छोड कर जीवन बितायें।
      कैसे एक व्यक्ति ईश्वर की करुणा का अनुभव कर सकते है? इब्रानियों के प्रति लिखे लेख में हम पढते हैं, हम भरोसे के साथ अनुग्रह क्रे सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी (इब्रा 4:16)। उचित समय पर अनुग्रह के सिंहासन के पास जाना, इसका मतलब क्या है?
          सन्त योहन ने इसे व्यक्त किया है। यदि हम अपने पाप स्वीकार करते हैं, तो वह हमारे पाप क्षमा करेगा और हमें हर अधर्म से शुद्ध करेगा, क्योंकि वह विश्वसनीय तथा सत्य प्रतिज्ञ है (1 योहन 1:9)। जो पश्चात्ताप करके पापों को छोडते हैं तो उन्हें पाप छमा मिलेगी। विश्वास ओर पश्चात्ताप के ज़रिए व्यक्ति को मुफ्त में पापक्षमा रूपी महान करुणा मिलेगी, किन्तु उस अपने जीवन में भोगना है तो आगे पाप न करने का फैसला भी लेना चाहिए। उसके अनुसार प्रयास भी करना चाहिए। एक शर्त है, आगे पाप मत करो (योहन 8:11)। ईश्वर की करुणा बेशर्त बतायी गयी है, मगर इसे हम नहीं भूलें। ईसा पश्चात्तापी पापियों को बुलाने आये। ईश्वर की करुणा के अनुभव के लिए पश्चात्ताप और पापरहित जीवन की ज़रूरत है।

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