The Power of the Holy Spirit In Life

Holy spirit

पवित्र आत्मा की शक्ति , जीवन में

      यदि पवित्र आत्मा की शक्ति से हम भर जायें तो आगे चल कर हमारे जीवन में सारे काम ठीक से चलेंगे, हर कही सफलता मिलेगी, कोई दु:ख नहीं होगा,ऐसा विचार कदापि न हो । क्योंकि पवित्र आत्मा से संचालित होते वक्त भी तकलीफें होगी, पराजय खानी पडेगी, संकटों का मुकाबला करना पडेगा । प्रभु ईसा का जीवन इसका उदाहरण  हैं । उनके जैसे प्रार्थना-चैत्तन्य और पवित्र आत्मा का अमिषेक प्राप्त कोई व्यक्ति इतिहास भर में नहीं जन्मा है । ऐसे प्रभु ईसा पवित्र आत्मा की शक्ति से भर कर नाज़रेथ के सभागह में अपने सार्वजनिक जीवन के उदघाटन के रूप में भाषण दिया । किन्तु वह प्रथम भाषण पराजित हो गया । सभागृह के सभी व्यक्ति उनका भाषण सुन कर नाराज़ हो उठे, वे ईसा को पकड कर गला दबाने लगे और पहाडी के ऊपर से नीचे गिराना चाहते थे । प्रभु का प्रथम काम तक पराजित हो गया । ईसा के तीन वर्षों के काम भी पराजय युक्त थे। उन्हें हर कहीं पराजय, तकलीफों, बाधाओं और कठिनाइयों का मुकाबला करना पडा । ऐसे अनुभव किसी को निरन्तर होते रहते हैं तो वह हताश’निराश हो जायेगा, ऊब जायेगा, थक जायेगा । वह अपने हर काम से पलायन करेगा । सन्त मारक्रुस ने लिखा हे कि गेथसेमनी बाग में ‘इंसा बेचैन और हताश होने लगे। तब पवित्र आत्मा मदद करने आया । तब उन्हें स्वर्ग का एक दूत दिखाई पडा (लूकस 22: 43) । जब प्रभु ईसा यर्दन नदी में बपतिस्मा पाते थे,तब स्वर्ग से जो स्वर सुनाईं पडा, वह इसायाह 42: 1-4 के पवित्र वचन है । वहाँ हम पढते हैं-यह न तो थकेगा और न हिम्मत हारेगा, जब तक यह पृथ्वी पर धार्मिकता की स्थापना न करे । जब जीवन में वारदातें, कठिनाइयाँ और पराजय होती हैं, तब टूटे बिना, हताश हुए बिना सुदृढ रहने और आगे बढाने के लिए पवित्र आत्मा हमारी मदद करने आता है ।
    यही अनुभव सन्त पौलुस को भी हुआ हैँ । प्नकाशनाओ कीं बढीती , से वे ज्यादा आनन्दित न हो इसलिए ईश्वर ने उन्हें एक कांटा दिया । वह कांडा कौन-सा था, कोई न बता पाया । इसलिए कुछ बाइबिल पंडित कुछ अनुमान लगाते हैं । किन्हीं का मत है कि उम्हें ज्यादा जडिकासक्ति होती थी और एक मत है कि वे मिरगी के रोग से परेशान थे। ओंर भी मत हे कि वे ठीक से नहीं देख पाते थे । अधिकांश पण्डितों का मत है कि सुसमाचार प्रचार के कार्य में उन्हें जो कठिनाइयाँ और बाधाएँ हुई, वे ही कांटा रहे । सन्त पौलुस और अन्य शिष्य किसी का बुलावा पा कर सुसमाचार प्रचार करने नहीँ गये । जहाँ कहीं वे गये, वह सुसमाचार सुनने के लिए हजारों की तादाद में स्रोता भी नहीं हौते थे । लौटाते वक्त यात्रा भत्ता के रूप में बडी रकम देने को भी कोई नहीं था । वे अपरिचितों के बीच पहूँच कर ईसा के बारे में बता रहे थे । कौन सी बात उन्होंने सुनायी, वह क्रूसित और उत्थित ईसा के बारें में थी, जो स्रोताओँ को मूर्खता लगता था । सुनने वालॉ ने ईसा पर न विस्वास किया और न पश्चात्ताप किया। किन्हीं ने उनका परिहास किया और वे सभा छोड कर चले । एथेन्स के अरियाप्पास में जो बुरा अनुभव हूआ, उसका स्मरण करें । किन्हींने उनके तर्कों का विरोध किया, धिक्कार किया, उन पर पत्थर मारा, उन्हें चाबुकं से मारा, सडक से खींच और कारागृह में डाल कर मार पीट की। इसके बिना अपने ही लोगों ने धोखा दिया। ऐसे कटु अनुभवों के कारण पौलुस हताश और निराश हो गये और वे प्रार्थना करने लगें कि अपना कांटा हटा दें।
      ईश्वर पौलुस की प्रार्थना का उत्तर दो प्रकार दे सकते थे। पहला, उनके ‘शरीर का कांटा हटा कर उन्हें सान्त्वना और सुख दें, दूसरा मांस में चुभो गया कांटा वहीं रख  कर अपना काम निभाने की शक्ति देना। ईश्वर ने द्वितीय प्रकार की कृपा पौलुस को दी । कठिन दर्द सहते हुए अपना प्रेरिताई काम उत्साह के साथ निभाना । पवित्र आत्मा हमें तकलीफों और पराजयों से नहीं बचाया, किन्तु इन से ऊब कर पलायन करने भी नहीं देता । वह सारे संघर्षो का मुकाबला करके सिर  उठा कर जीने की कृपा देगा । यदि कोई रबड का गेन्द या कोर्क पानी की गहराई में दबाये रखे और उसे छोडे तो जैसे वह जल्दी ही सतह पर आता है वैसे सारी तकलीफों’ और पराजयों का मुकाबला करके काम निभाने लायक पवित्र आत्मा हमें शक्ति प्रदान करेगा ।
          हमारे जीवन, समर्पण और कर्तव्य निर्वहण में पवित्र आत्मा की शक्ति नहीं मिली तो हम चंचल हो जायेगे। घरेलू जीवन बिताने वाली एक औरत के बारे में सोचें, जिसे पति का प्यार ज़रा भी नहीं मिलता, शाम की वेला में नशे से तराबोर होकर आयेगा और घर की चीज़ों को तोडेगा । फिर उस को मारेगा, पीटेगा । यह वर्षों का अनुभव है । साथ ही जो सन्तानें हैं वे भी नटखट, स्वच्छन्द और मर्यादाहीन हैं। यह बहिन हताश-निराश हो उठी । एक बार उसने सोचा कि घर बार छोड कहीं जाऊँ? मगर पवित्र आत्मा उसके आँसू पोंछेगा, किन्तु तकलीफों से मुक्ति नहीं देगा । बेटी,घबराओ मता। सुदृढ रहो’इस प्रकार मंत्रणा देकर पवित्र आत्मा शक्ति देगा ताकि हताश न हो जाये । कई पतियों का अनुभव है पत्नी उसकी आदत पर शंका प्रकट करे,परस्री संबन्ध का आरोप लगाये, हमेशा शिकायत करते फिरे, प्यार या सेवा न दे;ऐसी हालत में पति सोचेगा कि पत्नी ओर  सन्तानों को छोड कर कहीं जाये । तभी पवित्र आत्मा ज़रूर सान्त्वना देगा, किन्तु इन्हीं तकलीफों से मुक्ति न देगा । इस प्रकार व्रतनिष्ठ व्यक्ति को जीवन को क्रूस ढोना पडेगा, कर्म-क्षेत्र की कठिनाइयाँ भुगतनी पडेगी, कभी कभी चंचल और निराश होना पडेगा, किन्तु सबों का मुकाबला करके आगे जीने की मदद पवित्र आत्मा प्रदान करता हे । संक्षेप में यदि पवित्र आत्मा न सहारा देता तो हमारा पारिवारिक, पुरोहिताई, समर्पित जीवन का सर्वनाश हो जाता । उनकी शक्ति से हम अडिग रहते हैं ।
jesus holy spirit          हमारा आध्यात्मिक जीवन निरन्तर संघर्ष है। हमें बुरी आदतों और वासनाओं का शिकार होना पडता है, कभी कभी हम हताश-निराश हो जाते हैं । तभी बुराई के खिलाफ संघर्ष जारी रखने में पवित्र आत्मा शक्ति प्रादान करता है। कठिन निन्दा,परिहास और रोगों के बीच  में व्यक्ति शान्त और खुश नज़र आते हैं, तो उसके पीछे की शक्ति पवित्र आत्मा हें ।आध्यात्मिक ग्रन्थकार ने अपने एक परिचित स्रि के बारे में लिखा है वह स्री बधिर थी, करीब अन्धी थी, इस के बीच वह कैन्सर ग्रस्त भी हो गयी । रोग की चरमसीमा में भी वह शान्त, स्वस्थ और खुश नज़र आती थी। दूसरों की बातों में वंह जागरूक भी थी । लेखक का मत है कि ये सब पवित्र आत्मा की कृपा से हो रहे हैं । संक्षेप में हम सब पवित्रं आत्मा की कृपा से अपना जीवन अग्रसर कर रहे हैं ।
        केवल  जीवन-भार को ढोने के लिए ही नहीं, बल्कि बुराई और बुरे काम करने वालों के विरुद्ध शब्द उठाने, उनका धिक्कार करने  के लिए भी पवित्र आत्मा मदद देता है । प्रभु ईसा ने येरुशालेम मन्दिर में कर्मरत व्यापारियों को चाबुक से मार कर भगाया था न? इसके पीछे आत्मा की सशक्त प्रेरणा ज़रूर थी । प्रेरित पेत्रुस और योहन को यहूदियों ने पकड़ कर जेल में रखा और क्रूर यंत्रणाएँ दीं, फिर यह चेतावनी दी कि आगे ईसा के नाम पर न बोलें, न चमत्कार करें ओंर न निशानी दें। उन्होंने उन्हें  धमकी दी । जल्दी ही प्रेरितों ने उनसे कहा, आप लोग स्वयं निर्णय करें क्या ईश्वर की’दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें? (प्रे.च.4;19)। यही नहीं यहूदियों का कथन उन्हें स्वीकार्य नहीं, उन्होंने  स्पष्टत: कहा । क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके  विषय में नहीं बोलना हमारे लिये संभव नहीं (प्रे.च.4:20)। प्रे.त 4:23-31 में हम देखते हें कि आदिम कलीसिए एकत्रित हो कर यहूदियों का धिक्कर करती है, धैर्य के साथ उनका विरोध करती है। और एक मजे़दार बात है प्रे.च.5:17-20 में हम देखते हैं । जब योहन और पेत्रुस को यहूदियों ने जेल में बन्द किया तो खुद पवित्र आत्मा ने उन्हें जेल से छुडाया और बाहर लाकर कहा कि जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए । मतलब है कि हमें कभी कभी धैर्य के साथ काम करना होगा, बुराइयों का सामना करना होगा, जो ईश्वर  की इच्छा हे ।
        दु:श्मनों से डर कर जब पोप फ्रान्स के अवित्तोण में जा कर रहने लगे तो सीयेन्ना की सन्त कत्रीना ने उनसे कहा कि रोम लोट जाइए। एक स्री पोप को उपदेश दे, यह पवित्र आत्मा द्वारा प्रदत्त असाधारण धैर्य का उदाहरण है। जब रोम में पारिवारिक जीवन के बारे में सिनड चल रहा था, तब रोमांनिया निवासिनी आंका मरिया सेरणेय नामक डॉक्टर ने एक प्रबन्ध पेश करके सबों को चौंका दिया । उन्होंने कहा कि आधुनिक दुनिया की यथार्थ समस्या आर्थिक, मौसमी परिवर्तन संबन्धी या गरीबी नहीं, बल्कि पाप का आधिक्य है । फिर उन्होंने सधैर्य नेताओं से पूछा, ‘सटीक बातें किये बिना स्ववर्गानुराग, न्यायरहित तलाक आदि पापों को ‘आत्मा मारू’ क्यों नहीं बुलाते? इसके लिए कलीसिया के नेता क्यों अधीर हैं? पवित्र आत्मा कलीसिया के अन्दर भी प्रतिषेध उठाने लायक व्यक्तियों को तैयार करेगा, यह एक उदाहरण है । हर कहीं- कलीसिया, समाज और घर में -बुराइयों और अन्यायों का बोलबाला है, तब चुपचाप रहे बिना प्रतिषेध उठाने, प्रतिक्रिया व्यक्त करने का धैर्य हमें हो । हम मेमनों की भाँति दब्बू न _हो जायें बल्कि सिंहों की भाँति गर्जन करें। हम जानते हैं कि ईश्वर का मेमना ईसा  गरजता सिंह भी था । हम केवल अनुसरण, विनम्रता और शान्तता का नहीं बल्कि धैर्य और संघर्ष का भाव भी अपनाएँ ।मगर हमारा प्रतिषेध और विरोध घमण्ड का फल न हो, हठ का फल न हो। वह पवित्र आत्मा की सशक्त प्रेरणा से हो ।इसके लिए हम प्रार्थना करें और पवित्र आत्मा से भर उठें।

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